इस्तिखारा (Istikhara) करने का तरीका

इस्तिखारा (Istikhara) करने का तरीका

इस्तिखारा (Istikhara) क्यों किया जाता है?

जब हमें किसी चीज़ को करने या चुनने में कन्फ्यूजन हो तब हम हमारे दिल की तसल्ली के लिए अल्लाह की राह में इस्तिखारा (Istikhara) करते हैं जैसे कि हमे कोई शादी का रिश्ता आया हो या फिर हमें कोई कारोबार करना हो वगैरह!

बुखारी की रिवायत है हज़रत जाबिर इस हदीस के रावी हैं और फरमाते हैं रसूल ए अकरम सल्लाहो अलैहि वसल्लम हमें तमाम कामों में इस्तिखारा (Istikhara) की तालीम देते थे जिस तरह हमे क़ुरआन की सूरत की तालीम देते थे
सहीह बुखारी, हदीस न. 7390

मतलब जिस तरह सूरज की तालीम दे रहे हो उस तरह आप हमें इस्तिखारा की तालीम देते थे
आप सल्लाहो अलैहि वसल्लम फरमाते हैं तुम में से कोई शख्स कोई काम का इरादा करे तो वो फर्ज के अलावा 2 रकाअतें पढ़ें फिर दुआ ए इस्तिखारा पढ़ें
इस इस्तिखारा को नबी सल्लाहो अलैहि वसल्लम ऐसे सिखाते थे जैसे नमाज़ की सूरतों को सिखाया करते थे
जबकि इस्तिखारा बहुत आसान है फर्ज के अलावा 2 रकाअतें निफिल नमाज़े पढ़ें फिर दुआ ए इस्तिखारा पढें यही है इस्तिखारा का तरीका

लेकिन आज इस्तिखारा को बहुत पेचीदा बनाकर पेश किया जा रहा है और अजीबो गरीब ढंग से उम्मत ए मुस्लिमा के मालों को लूटा जा रहा है
दुआ ए इस्तिखारा आपको मसनून किताबों में मिलेगी और दुआ ए इस्तिखारा सिर्फ एक ही दुआ है इससे हटकर कोई दुआ नही है क्यों नही है क्योंकि सलातुल इस्तिखारा के बाद जो दुआ है उसके अल्फाज नबी सल्लाहो अलैहि वसल्लम ने सहाबा को सिखाएं हैं उससे हटके हमे नही पढ़ना है क्योंकि आप सल्लाहो अलैहि वसल्लम दुआएं इस तरह से सिखाते थे जैसे सूरतें सिखाते थे।

अगर आपसे कोई कहे कि इस्तिखारा की यह दुआ पढ़ लें वो दुआ पढ़ लें तो आप न पढ़ें इस्तिखारा की सिर्फ एक ही मसनून दुआ है जिसे आप नेट पर से भी देख सकते हैं
उस दुआ के बीच में एक ब्रैकेट (खाली हिस्सा) आएगा जिसमे आपको अपना मसला रखना है फिर उसके आगे से दुआ को कंटिन्यू करना है
अगर दुआ एक इस्तिखारा किसी शख्स को याद न हो तो वह देखकर पढ़ें अगर देखकर भी नही पढ़ सकते हैं तो किसी से पढवाये और उस लफ्ज को दोहराए

इस्तिखारा (Istikhara) का वक़्त

इस्तिखारा की कोई खास रात या कोई खास वक़्त नही है आप चाहें जब इस्तिखारा कर सकते हैं फजर, जोहर, असर, मगरिब, ईशा जिस भी वक़्त आप चाहें इस्तिखारा कर सकते हैं
सहीह बुखारी, हदीस न. 7390
लेकिन दुआ के कबूलियत के वक्त में इस्तिखारा करना बेहतर है क्योंकि इस्तिखारा भी एक दुआ है

अल्लाह तआला कभी इस्तिखारा का जवाब खवाब में भी दे देता है पर यह जरूरी नही है कि आपको ख्वाब आये इस्तिखारा का ख्वाब से का कोई ताल्लुक़ नही है।

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